शुक्रवार, 7 मई 2010

‘मैं जिंदा हूं...

मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिए,
मेरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए’।
दिल ही तो है न संगो-ख़िश्त,
दर्द से भर न आए क्यों,
रोएंगे हम हजार बार,
कोई हमें सताए क्यों।

दिल मिलने के भी नगमे होते हैं

टूटे दिलों के भी सपने होते हैं।
दिल मिलने के भी नगमे होते हैं।
गर कोई ग़म आए आपकी जिंदगी में,
हमें याद करना, क्योंकि अपने तो अपने होते हैं।

उनकी अदावत का अंदाज कुछ ऐसा है

उनकी अदावत का अंदाज कुछ ऐसा है।
जख्म देकर पूछते हैं अब हाल कैसा है।
किसी एक से हम गिला भी क्या करें,
सारी दुनिया का मिजाज ही कुछ ऐसा है।

रविवार, 2 मई 2010

जब बरसात मुझे भिगो रही थी..

जब बरसात मुझे भिगो रही थी
तुम साथ थे
जब सूरज मुझे जला रहा था
तुम साथ थे
जब चारों ओर घना अंधेरा था
तुम साथ थे
जब उजाला आखों को चुंधिया रहा था
तुम साथ थे
जिंदगी में जब जब तन्हा थे हम
तुम साथ थे
जब भीड़ में थे, तब भी
तुम साथ थे
फिर आज क्या हुआ
कैसे तुम किसी और के साथ हो गए
दामन छोड़ने का क्या कुछ अफसोस था
ये साथ तो जन्मों का था
फिर चंद कदमों पर
क्यों ये फासले हुए
जिंदगी की पगडंडी थे हम
फिर मंजिल कोई और
कैसे बनी
बोलो ना
हमसाया से साया बनने का वादा था
फिर आज ये साया
किसी और की
परछाई कैसे बना
बोलो ना ..
तुम तो मेरे साथ थे
फिर किसी और के
हमसाया, हमदम कैसे बने
बोलो ना...

रात फिर रो कर गुजार दी

आज सुबह का सूरज सफेद था
हवा भी थी खुशक बहुत
लगता है रात फिर रो कर गुजार दी उसने।।

उसने कभी नहीं कहा
उसे है शिकायत बहुत
उस तरफ से आती भीगी हवा
छुपे राज खोल गयी।।

जी तो सभी लेते हैं
चाहे टुकडों में मिले जिन्दगी
बहुत कम उन टुकडों को सीना जानते हैं।।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

दिन रात बरसता बादल नहीं देखा

दिन रात बरसता बादल नहीं देखा
आखों की तरह कोई पागल नहीं देखा

क्यों लोग दुहाई देते हैं रिश्तों की
इस पेड़ पर हमने ने कभी फल नहीं देखा

इंसान दरिंदों की तरह घूमते हैं यहां
शहरों की तरह जंगल नहीं देखा

हम खुद उदासी में ही खुश रहते हैं
ख्वाबों में भी हमने कभी मखमल नहीं देखा

ज़रा बेरहम है मोहब्बत मेरी...

ये जिंदगी हर लम्हा मुझे तड़पाने लगी है
भूलने की कोशिश में वो और याद आने लगी है

उसे अपने दिल से मिटाऊं तो कैसे
जो धड़कन बनकर दिल धड़काने लगी है

सासों में उसी की महक आती है
वो हवाओं को खुशबू बन महकाने लगी है

ज़रा बेरहम है, मोहब्बत मेरी
होकर जुदा आज़माने लगी है

न जाने किस बात की सज़ा, दे रहा है ख़ुदा
इंतजार-ए-इश्क की हद आने लगी है

उसके बगैर ना जीना, ना तमन्ना जीने की
विरहा की अग्नि मुझे जलाने लगी है

हाल-ए-दिल कैसे करूं मैं बयां
जुदाई में जां मेरी जाने लगी है

तन्हाई मे अक्सर आती हैं उसकी सदाएं
वो शब्दों में ढलकर कविता बन जाने लगी है