बुधवार, 1 अप्रैल 2009

कैसे बदले भारत की तस्वीर.....?

आज जिसे देखो....बदल डालो, पलट डालो, अभी नहीं तो कभी नहीं और आपका वोट आपकी सरकार जैसे जुमलों पर चर्चा कर रहा है। प्रिन्ट हो या फिर टीवी वाले अपने -अपने अंदाज मे चीख और चिल्ला रहे हैँ। देखकर लगता है कि बस अब सब कुछ बदलने ही वाला है। लगता है कि बस अब हिन्दुस्तानियों का सोया हुआ ज़मीर जागने ही वाला है। लगता है कि इस बार जनता लोकसभा चुनाव में ऐसे नेताओं को अपना सांसद चुनेगी, जिनका अपराध और दबंगई से दूर-दूर का नाता नहीं रहा है। जोर-शोर से परिवर्तन का कैम्पेन चलाया जा रहा है। विचारों का महायुद्ध टीवी और अखबार पर दिखाया जा रहा है। जिसे जैसे मौका मिल रहा है, वैसे ही कहे जा रहा है। तमाम नई -पुरानी कड़ियों को जोड़कर इस तरह से ख़ाका खींचा जा रहा है, कि जनता को कुछ काम ही नहीं है, बस नेताओं को बदल दो, सब कुछ अपने आप बदल जाएगा। लेकिन ज़रा सोचिए.....ये निरीह, बेचारी जनता करे तो क्या करे। जब राजनीतिक पार्टियां ही गुण्डे, दादा, हत्यारोपी, किडनैपर, भूमाफिया और वसूली करने वालों को ही टिकट देती हैं, तो जनता के पास किसी और को चुनने का विकल्प ही कहां बचता है।
किसी भी पार्टी को देख लीजिए, सौ में से नब्बे बेईमान वाला जुमला साबित हो जाएगा। किसी वजह से अगर एक पार्टी ने किसी गुण्डई करने वाले नेता को अपने यहां से निकाल दिया, या टिकट नही दिया, तो विरोधी पार्टी ऐसे नेता को तुरंत लपक लेती है, ना सिर्फ लपक लेती है, बल्कि बड़े जोर-शोर औऱ तामझाम के साथ उसका पार्टी में स्वागत किया जाता है। कोई ईमानदार और साफ सुथरी छवि वाला, पढ़ा लिखा, विचारों से समृद्ध व्यक्ति चुनाव लड़ना चाहे तो ये राजनीतिक पार्टियां उसे टिकट नहीं देती हैं। बस यहीं सारा गड़बडझाला होता है। पार्टियां ऐसे ईमानदार व्यक्ति को टिकट देंगी नहीं, और निर्दलीय लडने पर जनता उसे वोट नहीं देती है। वज़ह भी साफ है बिना किसी पार्टी से जुड़े ऐसे ईमानदारों को न तो प्रचार मिलता है और न ही किसी दल से जुड़े होने की पहचान। फिर कैसे बदले भारत की तस्वीर। जब सीरत ही गंदी है तो सूरत बदलना तो दूर की कौड़ी है।

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